आदर्श नारियाँ‎

माता जानकी

सीता रामायणऔर रामकथा पर आधारित अन्य रामायणो जैसे रामचरितमानस की मुख्य पात्रा है। सीता मिथिला के राजा जनक की सबसे बड़ी पुत्री थी इनका विवाह अयोध्या के राजा दशरथ के ज्योष्ठ पुत्र राम से स्वयंवर में शिव का धनुष भंग करने के उपरांत हुआ था।

दुनिया के बड़े-बड़े सवाल चुप्पी में से उपजे हैं और दुनिया के बड़े-बड़े प्रश्नों के उत्तर वाणी नहीं, कर्म से दिए गए हैं। सीता का पृथ्वी प्रवेश सीता के द्वारा पूछा गया विकट प्रश्न भी है और इस प्रश्न का उत्तर भी कि वे निष्पाप थीं या नहीं।

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अन्त में जब कुश और लव रामकथा सुना चुके होते हैं, और अश्वमेध यज्ञ के बाद सारे अयोधयावासी तृप्त हुए पड़े थे तो एक आवाज उठी कि राम सीता को फिर से स्वीकार कर अपना घर बसाएं। राम ने सीता का यूं ही परित्याग नहीं किया था। वे जानते थे और पूरे अन्त:करण से मानते थे कि सीता निष्कलंक है। पर महज इस लोकापवाद के भय से कि राजा को संदिग्ध आचरण वाला मानकर कहीं पूरी प्रजा ही दुराचारी न हो जाए, राम ने सीता का परित्याग किया था। राम साफ-साफ कहते हैं कि ‘सेयं लोकभयात् ब्रह्मन् अपापेत्यभिजानता, परित्यक्ता मया सीता’ (उत्तरकाण्ड, सर्ग 97, श्लाक 4) ‘हे, ब्रह्मन् वाल्मीकि, मैं जानता हूं कि सीता निष्पाप है, पर लोकभय से ही मैंने इसका परित्याग किया है।’ राम कहते हैं कि अगर वाल्मीकि जन समाज में सीता की निष्पापता की घोषणा कर दें और लोग मान लें तो वे सीता को फिर से ग्रहण करने को तैयार हैं। यहां तक तो सब सामान्य गति से चल रहा होता है। पर असाधारण घटना तब घटती है, जब सीता राजमहल में प्रवेश करती हैं। उन्होंने उस वक्त गेरुआ कपड़े पहन रखे थे, चेहरा नीचे की ओर झुका था और उनकी आंखें नीचे पृथ्वी की ओर देख रही थीं। बिना पलक ऊपर उठाए और बिना पल भर की प्रतीक्षा किए आते ही सीता ने पृथ्वी को सम्बोधित करते हुए जो कहा, उसे वाल्मीकि ने तीन भव्य श्लोकों में काव्यबध्द कर दिया है जिन्हें पूरी तरह अर्थसहित उध्दत नहीं करेंगे तो हम महान अन्याय कर रहे होंगे:यथाहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये।

तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये।
तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।
यथैतत् सत्यमुक्तं मे वेह्नि रामात् परं न च।
तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति॥
(उत्तराकाण्ड, सर्ग 97, श्लोक 14-15)

अर्थात् ‘अगर मैंने मन से राम के अलावा किसी के बारे में न सोचा हो तो माधवी देवी (पृथ्वी) मुझे अपने में समा लें। अगर मैं मन, वाणी और कर्म से सिर्फ राम की अर्चना करती हूं तो यह माधवी देवी मुझे अपने में समा लें। अगर यह सच है कि राम के अतिरिक्त मैं किसी को नहीं जानती तो यह माधवी देवी मुझे अपने में समा लें।’ इसके बाद सीता पृथ्वी में समा जाती हैं।

अब तर्क यह हो सकता है कि क्या कहीं ऐसे पृथ्वी फट जाया करती है? हो सकता है वाल्मीकि ने एक कोरी गप मार दी हो। पर वाल्मीकि को ऐसी गप हांकने की क्या जरूरत थी? और अगर यह घटना इस देश के बच्चे को जन्म से पहले ही, गर्भावस्था में ही मानो याद करा दी जाती है तो जाहिर है कि अपनी निष्पापता साबित करने की चुनौती में सीता ने कुछ ऐसा विकट कर्म किया था कि उसे पृथ्वी में समा जाने से कम कोई उपमा इस देश को और उसके आदिकवि को सूझी ही नहीं। हो सकता है कि उन्होंने अपने ही प्रयासों से पृथ्वी में स्वयं को विलीन कर वैसे ही समाप्त कर दिया हो जैसे बाद में राम ने स्वयं को जल को समर्पित कर महासमाधि ले ली थी।

पर हमारा कहना कुछ और है। सीता ने अपनी निष्पापता साबित भी कर दी और उन्होंने खुद को भी नष्ट कर दिया, ऐसा क्यों किया? क्यों नहीं वे प्रजा की जयजयकार और पुष्पवृष्टि के बीच फिर से अपने राम के साथ सुखमय जीवन बिताने को तैयार हुईं? राम तो उन्हें निष्पाप मानते ही थे और सीता को भी इस बात का अखंड विश्वास था, ऐसा वाल्मीकि रामायण में कई बार स्पष्ट हो जाता है। सिर्फ राजा की मर्यादा की रक्षा के लिए, लोकापवाद से बचने के लिए ही राम ने सीता का परित्याग किया, यह भी राम ने एकाधिक बार स्पष्ट कर दिया था। फिर जब वाल्मीकि के कथन पर जन समुदाय सीता को निष्पाप मानने और क्षमायाचनापूर्वक स्वीकारने को तैयार था तो क्यों नहीं सीता ने लोकस्वीकृति को महत्व दिया और क्यों स्वयं को पृथ्वी में समा दिया?

दुनिया के बड़े-बड़े सवाल चुप्पी में से उपजे हैं और दुनिया के बड़े-बड़े प्रश्नों के उत्तर वाणी नहीं, कर्म से दिए गए हैं। सीता का पृथ्वी प्रवेश सीता के द्वारा पूछा गया विकट प्रश्न भी है और इस प्रश्न का उत्तर भी कि वे निष्पाप थीं या नहीं। सीतारामचरित के इतिहास के पिछले पृष्ठों को थोड़ा पढ़ लिया जाए। युध्दकाण्ड के अंत के बाद, अपहरणकर्ता राक्षस के अपने पति के हाथों मारे जाने के बाद प्रसन्न सीता अपने पति से मिलने जा रही हैं तो उनके शरीर के अंग लज्जा के मारे अपने में ही सिमटते जा रहे हैं। (लज्जया त्वलीयन्ती स्वेषु गात्रेषु मैथिली, युध्दकाण्ड, सर्ग 114, श्लाक 34) और वे विस्मय, प्रभूत हर्ष और स्नेह के साथ पति के सौम्य मुख को निहारने लगीं ‘विस्मयाच्च प्रहर्षायच्च स्नेहाच्च पतिदेवता, उदैक्षत मुखं भर्तु: सौम्यं सौम्यतरानना (वही, श्लाक 35) पर इस प्रतीक्षारत, सकुचाती, लज्जामयी और प्रेमपरिपूर्णा सीता को सुनने को क्या मिला? यह कि राम चाहते हैं कि सीता पहले अपना चरित्र शुध्द करके दिखाएं। उस वक्त राम इतने दुर्विनीत हो गए थे कि सीता से कहने लगे कि वह जहां चाहें, जिसके पास चाहें चली जाएं। जाहिर है कि राम ने यह उध्दत वाणी भी लोकापवाद के भय से कही। अन्यथा वे तब भी सीता को हृदयप्रिया ही मानते थे, (युध्दकाण्ड, सर्ग 115, श्लाक 11) हालांकि तब उन्हें लोक से कोई वैसी शिकायत नहीं मिली थी जैसी राज्याभिषेक के बाद मिली। पर सम्भावित लोकापवाद के भय से रूखे और निष्ठुर राम को सीता ने कई तरह से समझाया, उलाहना दिया, पर राम अपनी बात पर अड़े रहे, तो लक्ष्मण से सीता ने चिता तैयार करने को कहा और अग्नि में प्रवेश कर लिया, यह कहते हुए कि अगर मेरा चरित्र शुध्द हो तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें-कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यमहम् राघवं सर्वधर्मज्ञं तथा मां पातु पावक: (युध्दकाण्ड, सर्ग 116, श्लोक 27)। अग्निदेव ने सीता की रक्षा कर ली।

क्यों नहीं दूसरी बार भी सीता ने अपनी रक्षा की प्रार्थना कर राम के साथ शेष जीवन बिताने की इच्छा वैसे ही प्रकट की जैसे अग्निप्रवेश के समय की थी? क्या इसलिए कि पहली बार उन पर संदेह उनके पति ने किया था जिसका निवारण करना, तमाम परिस्थितियों को देखते हुए, सीता ने अपना कर्तव्य समझा और दूसरी बार उन पर संदेह उनके पति ने नहीं बल्कि समाज ने किया था जिसके निवारण की कोई जरूरत उन्हें नहीं लगी? क्या इसलिए कि अपने पति के संदेह का निवारण करना सीता को अपना कर्तव्य लगा, पर समाज द्वारा उठाए गए संदेह का निवारण करना उन्हें कतई अपना कर्तव्य नहीं नजर आया?

क्यों? इसलिए कि अपने गहरे मौन के जरिए इस बार सीता ने राम को जता देना चाहा कि बेशक इस बार आक्षेप तुमने नहीं, समाज ने लगाया हो, पर इस बार असली दोषी तुम हो। सीता मानो कहना चाहती हैं कि हे राम, बेशक मेरा निर्वासन कर, मुझसे दूर रहकर अकेले में अपने हृदय को कष्ट देकर तुमने श्रेष्ठ नायक, मर्यादापुरुषोत्तम राजा का पद पा लिया हो, पर मर्यादायुक्त पति के सिंहासन तक तुम नहीं पहुंच पाए। क्योंकि इस बार आक्षेप सीता पर कम बल्कि एक राजा के आचरण पर ज्यादा था कि वे राजा होने के कारण प्रजा में अपवाद को बढ़ने दे रहे थे। तो राम को क्या करना चाहिए था? राम के पास दो विकल्प थे कि वे सीता से खुद को अलग कर लेते या सीता के साथ रहने का निर्णय कर खुद को राजपाट से अलग कर लेते। पहला विकल्प आसान था, पर दूसरा कठिन, इसलिए कि उसमें सीता को निष्पाप सिध्द करने का दायित्व भी राम पर ही आता और इसलिए भी कि सीता राम की सन्तति की मां बनने वाली थीं। पर राम ने पहला और आसान विकल्प चुना और सीता को निर्वासित कर दिया। सीता को निष्पाप साबित करने के लिए खुद को दण्डित कर दिया। वे प्रजा से कह सकते थे कि क्यों सिर्फ नारी ही परीक्षा का विषय होना चाहिए? क्यों नहीं आरोप लगाने वाली प्रजा की भी परीक्षा होनी चाहिए? अर्थात् वे सीता को, उनके बीज को धारण कर चुकी गर्भिणी सीता को, जिनकी निष्पापता पर उन्हें कभी कोई शक ही नहीं रहा ऐसी सीता को, जो उनकी निश्छलता और स्नेह पर शतप्रतिशत मुग्ध थीं, ऐसी सीता को बिना निर्वासित किए, बिना पलभर का कष्ट दिए प्रजा से कह सकते थे कि जो प्रजा ऐसी सीता को अपना नहीं सकती, वह सीता के पति राम के लायक भी नहीं।

पर राम ने ऐसा नहीं किया और दूसरी बार निष्पापता सिध्द करने के लिए बुलाई गई सीता ने अपने पति की इस दुर्बलता का, अपनी पत्नी की रक्षा कर पाने में असफलता का, पति की तुलना में अपने राजा होने को अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति का विरोध इस तरह से किया कि बिना पति से एक शब्द कहे, बिना उसकी ओर निहारे, यहां तक कि उसी की भक्ति की शपथ उठा कर सीता पृथ्वी में समा गईं और मानो राम से कह गईं कि हे राम, तुम्हें मैं प्रिय अवश्य हूं, मेरे बिना तुम व्याकुल भी हो, पर अपनी प्रजा के आगे तुम विवश हो, प्रजा के लिए मेरा ही बार-बार अपमान करते हो, तो इस अपमान को बार-बार सहना मेरे लिए सम्भव नहीं। अनन्य प्रेम से भरे पति के साथ शेष जीवन बिताने का विकल्प सीता ने इसलिए नहीं चुना, क्योंकि एकाधिक बार साबित हो चुका था कि राम प्रजा और सीता के बीच प्रजा की निराधार आरोप वाणी को ही हमेशा अधिक महत्व देंगे और सीता बार-बार एक प्रेम से भरे पर कमजोर पति की खातिर अग्निपरीक्षाएं देने की तैयार नहीं थीं।कौन जाने सीता क्या कहना चाहती थीं? बिना पल भर विलम्ब किए सीता का पृथ्वी प्रवेश कितने सवाल खड़े कर गया है, जिनमें से सबसे बड़ा सवाल यकीनन राम से है कि क्या पति के नाते उनका कोई कर्तव्य नहीं था? सीता के सहसा पृथ्वी में प्रवेश कर जाने से राम देर तक रोते रहे। थोड़ी देर बाद क्रोधाविष्ट होकर पृथ्वी को ललकारने लगे कि सीता को वापस करो अन्यथा वे बाणों से उसे विर्दार्ण कर पर्वत-समुद्र सहित हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर देंगे! सीता मानो अपने पृथ्वी प्रवेश से उपजे सन्नाटे में राम से कह रही थी कि हे राम, ऐसा ही उद्वेग तुमने तब क्यों नहीं दिखाया, जब मुझ पर झूठे आरोप लग रहे थे?

द्रौपदी

हर पुरुष प्रधान इतिहासकारों की जमात के पास पूरा मौका द्रौपदी पर आरोप लगाने का था कि वह पांच पुरुषों की पत्नी है और इसलिए दुश्चरित्र है। पर क्या इतिहास द्रौपदी पर ऐसा कोई ओछा आरोप लगाने का दुस्साहस कर सका?

द्रोपदी को जुए में हार जाने का क्षुद्र और पाप कर्म करने के बाद युधिष्ठिर की तो बोलती बन्द हो गई। धृतराष्ट्र एवं दुर्योधन की सेवकाई में खड़े भीष्म, द्रोण आदि के पसीने तो छूट रहे थे, पर मुंह नहीं खुल रहा था। द्रौपदी को जीत लेने के मद में जब दुर्योधन ने विदुर को द्रौपदी को राजसभा में लाने का आदेश दिया तो दुर्योधन को अभूतपूर्व फटकार सुनाने के बाद महात्मा विदुर ने एक सवाल भी खड़ा कर दिया ‘अनीशेन हि राज्ञैषा पणे न्यस्ता’ (सभापर्व 66.4) अर्थात् राजा युधिष्ठिर ने खुद को जुए में हारकर द्रौपदी को दांव पर लगाया है, तो क्या हारा हुआ आदमी किसी को दांव पर लगा सकता है?

विदुर ने क्या कहा, इसकी द्रौपदी को कोई खबर नहीं थी। पर जो सवाल विदुर ने किया, ठीक वही सवाल द्रौपदी का भी था। विदुर द्वारा द्रौपदी को राजसभा में लाने से साफ मना कर देने पर दुर्योधन ने अपने एक दूत प्रातिकामी को द्रौपदी को राजसभा में लाने का आदेश दिया। प्रातिकामी तीन बार गया परन्तु द्रौपदी ने हर बार उसे एक-एक सवाल पूछकर वापस भेज दिया।

पहली बार का सवाल था, ‘जाकर उस जुआरी महाराज से पूछो कि वे पहले खुद हारे थे या पहले मुझे हारे थे?’ युधिष्ठिर कोई उत्तर नहीं भिजवा पाए। दूसरी बार सवाल कुरुवंशियों से था, ‘कुरुवंशियों से जाकर पूछो कि मुझे क्या करना चाहिए? वे जैसा आदेश देंगे, मैं वैसा करूंगी।’ सवाल सीधा धृतराष्ट्र और भीष्म सरीखे कुरुवंशियों से था और आदेश भी उन्हीं से मांगा जा रहा था, पर वे सब सिर नीचा किए रहे और उनके मुंह सिले रहे।

बस, एक सन्देश युधिष्ठिर का गया कि अगर तुम रजस्वला और एकवस्त्र होने के बावजूद राजसभा में आओगी तो सभी सभासद मन ही मन दुर्योधन की निन्दा करेंगे। प्रातिकामी तीसरी बार फिर द्रौपदी के पास गया तो उतावले दुर्योधन ने इस बीच दुश्शासन को द्रौपदी को लाने को भेज दिया और उसके बाद जो दुर्घटित घटा वह हर भारतवासी जानता है।

हम संकेत विदुर और द्रौपदी द्वारा पूछे गए सवालों की ओर कर रहे थे। दुःशासन द्वारा बालों से घसीटी जाती हुई और निर्वस्त्र की जाती हुई द्रौपदी ने राजसभा में लाए जाने के बाद अपनी इस दुरावस्था में भी वही सवाल दूसरे शब्दों में पूछा जो विदुर ने पूछा था, ‘इमं प्रश्नमिमे ब्रूत सर्व एव सभासद:, जितां वाप्यजितां वा मां मन्यध्वे सर्वभूमिपा:?’ (सभापर्व 67.41) अर्थात ‘सारे राजन्य लोग जो यहां बैठे हैं मुझे बताएं। मेरे इस सवाल का जवाब दें कि मैं (धर्म के अनुसार) जीती गई हूं या नहीं?’ भीष्म बोले कि धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण मैं कुछ बता नहीं सकता। बाकी कोई कुछ बोला ही नहीं।

सभी अपने-अपने मुंह पर धृतराष्ट्र और दुर्योधन से मिलने वाले वेतन की पट्टी बांधे बैठे रहे। बेशक महाभारतकार ने और इतिहास ने धर्मराज का खिताब महाराज युधिष्ठिर को दे दिया हो, पर धर्म पर जैसा सटीक आचरण द्रौपदी ने आजीवन किया उसकी कोई दूसरी मिसाल पूरे महाभारत में हमें नहीं मिलती।

युधिष्ठिर के जीवन में फिर भी एक घटना ऐसी घटी कि उन्हें भी परोक्ष रूप से झूठ का सहारा लेना पड़ा जब उन्होंने यह जानते हुए भी कि द्रोणपुत्र अश्वत्थामा जीवित हैं और अश्वत्थामा नामक हाथी ही मरा है, झूठ बोल दिया कि ‘पता नहीं हाथी मरा है या मनुष्य, पर अश्वत्थामा मारा गया है।’ इसी कथन पर द्रोण ने हथियार फेंक दिए और द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न के हाथों मृत्यु का वरण किया। किन्तु द्रौपदी पर तो आप ऐसे किसी छोटे से अधर्माचरण का भी आरोप नहीं लगा सकते।

एक दो उदाहरणों की परीक्षा कर ली जाए। अपने स्वयंवर में द्रौपदी ने कर्ण को मछली की आंख पर बाण का निशाना लगाने से रोक कर ठीक किया या गलत? बेशक कर्ण को मौका नहीं दिया गया और कह सकते हैं कि उससे अन्याय हुआ। पर हमें नहीं भूलना चाहिए कि छत पर लटकती, झूलती उस यंत्र-मछली की आंख फोड़ने की शर्त बेशक पिता द्रुपद ने रखी थी, पर विवाह तो द्रौपदी का होना था। स्वयंवर तो द्रौपदी रचा रही थी। अपना वर तो स्वयं द्रौपदी को चुनना था। चाहे कारण तब की सामाजिक प्रथाएं रही हों या कोई और, स्वयं वर चुनने का अधिकार-प्राप्त द्रौपदी को हक था कि वह अपनी शर्त पूरा करने का मौका किसे दे और किसे न दे। कर्ण को मना करने वाली द्रौपदी पर आज तक इतिहास आरोप नहीं लगा पाया कि उसने वैसा कर कोई गलत काम किया।

हर पुरुष प्रधान इतिहासकारों की जमात के पास पूरा मौका द्रौपदी पर आरोप लगाने का था कि वह पांच पुरुषों की पत्नी है और इसलिए दुश्चरित्र है। पर क्या इतिहास द्रौपदी पर ऐसा कोई ओछा आरोप लगाने का दुस्साहस कर सका? बल्कि यहां तो माजरा ही अलग है। द्रौपदी का पांचों पाण्डवों से विवाह हो या न हो, इस पर कुन्ती विस्मित है, धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर चिन्तित हैं और पिता द्रुपद किंकर्तव्यविमूढ़ हैं। पर द्रौपदी? उसके चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं, उसके व्यवहार में कोई उतावलापन नहीं और आगे चलकर पांच पतियों की अकेली पत्नी के रूप में उस पर किसी को कोई आपत्ति तक नहीं।

बल्कि पांच पतियों की अकेली पत्नी के रूप में द्रौपदी का आचरण् इतना आदर्श और अनुकरणीय माना गया, तभी तो महाभारतकार ने उसके इस पत्नी रूप को दैवी गरिमा प्रदान कर दी और कई ऐसी कथाओं-उपकथाओं की सृष्टि अपने प्रबंधकाव्य में की जिससे द्रौपदी का जीवन दिव्य वरदानों का परिणाम नजर आए। जैसे कुन्ती के प्रणीत पुत्रों को देवताओं का आशीर्वाद बताकर गौरव से भर दिया गया, वैसे ही द्रौपदी के पांच पुरुषों (बेशक पांचों भाइयों) की पत्नी होने को भी तपस्या और वरदान का नतीजा बताकर उसे आभा से भर दिया गया। महाभारतकार और इतिहास का द्रौपदी के प्रति इससे बड़ा श्रध्दावदान और क्या हो सकता है?

बेशक महाप्रस्थानिक पर्व (अध्याय 2, श्लोक 6) में युधिष्ठिर फतवा-सा दे देते हैं कि चूंकि द्रौपदी का अर्जुन से विशेष पक्षपात था, इसलिए वह सबसे पहले मृत्यु को प्राप्त हो रही है। पर न तो महाभारतकार और न ही जनसामान्य ने इस युधिष्ठिर वाणी को कोई मान्यता दी है। और अगर पक्षपात था भी तो वह स्वाभाविक और धर्मपूर्ण था और स्वयंवर- कथा का जानकार हर भारतवासी इसके पीछे का रहस्य जानता है कि अर्जुन के कारण ही द्रौपदी पांचों भाइयों की पत्नी बन सकी थी।

बाल्यकाल में मिले जिस प्रशिक्षण के कारण द्रौपदी और धृष्टद्युम्न का जैसा प्रतिरोधी चरित्र बना, क्या उसमें भी हमें अन्तर नहीं देखना चाहिए? धृष्टद्युम्न तो इस हद तक चला गया कि उसने निहत्थे द्रोण का सिर अपनी तलवार से काट दिया। और जब अर्जुन, सात्यकि आदि ने उसके इस कठोर कर्म की भर्त्सना की तो द्रुपदपुत्र ने अपने कृत्य का पुरजोर समर्थन किया। उसके कुछ तर्क तो दिमाग को हिला देने वाले हैं। मसलन उसका यह सवाल (द्रोण् पर्व, 197, 24-26) कि यज्ञ, अध्यापन आदि कर्म कभी न करने वाले द्रोण को किस आधार पर ब्राह्मण जैसा मान लिया जाए? पर अपने भाई के इस तरह के मानस के बावजूद, अपने चीरहरण के समय द्रोण के चुप रह जाने के बावजूद, अभिमन्यु को घेरकर की गई हत्या में शामिल सात महारथियों में द्रोण के शामिल होने के बावजूद द्रौपदी ने द्रोणाचार्य का हमेशा सम्मान रखा और अपने पतियों का गुरु होने का आदर उन्हें हमेशा दिया।

उसने गुरुपुत्र होने के कारण ही उस अश्वत्थामा का भी वध नहीं होने दिया, जिसने उसके पांच पुत्रों की सोते में हत्या कर दी थी। तुलना करेंगे तो ही द्रौपदी के चरित्र की विलक्षणता समझ में आएगी। भाई धृष्टद्युम्न ने चारों ओर से अपने लिए बरसती धिक्कार की परवाह न करके निहत्थे द्रोण को मार डाला, क्योंकि उस पर वैसा न करने का कोई दबाव नहीं था। परन्तु द्रौपदी ने इस हद तक नैतिक बंधन में खुद को बांध लिया कि उसने न केवल वह आदर द्रोण को दिया, बल्कि द्रोण पुत्र अश्वत्थामा को क्षमा करने में भी द्रौपदी ने अपने इसी नैतिक शिखर का परिचय दिया। जब भी मौका मिला, द्रौपदी ने अपने पतियों को पुरुषार्थ से भर देने का कर्तव्य निभाया, बेशक पूरे धैर्यपूर्वक वह उनके साथ वनवास और अज्ञातवास के कष्ट भी भोगती रही।

अगर युधिष्ठिर की बात ही मान ली जाए कि द्रौपदी का अपने पांचों पतियों में से अर्जुन से विशेष अनुराग था, तब तो इसे हम द्रौपदी का परम बलिदान माने बिना नहीं रह सकते कि वनवास के दौरान जब वेदव्यास ने अर्जुन को तपस्या करने को कहा तो अर्जुन के बिना न रह सकने वाली द्रौपदी न उसे उग्र तपस्या की प्रेरणा दी और भरोसा दिलाया कि वह उसके बिना भी यथाकिंचित रह लेगी (वन पर्व, अध्याय37)

द्रौपदी के अद्वितीय नारी चरित्र के एक रूप की चर्चा हम लोगों के बीच बहुत कम होती है कि वह कृष्ण की सखी थी। द्रौपदी का एक नाम कृष्णा भी है। वह सांवली थी, इसलिए भी और कृष्ण की सखी थी, इसलिए भी। पर आगे चलकर कर्मकाण्डी लोगों ने कृष्ण की बहन बताकर द्रौपदी को कृष्णा प्रचारित करवा दिया। ऐसा मानस द्रौपदी के अद्वितीय चरित्र को भला क्या समझेगा?

पर ऐसा मानने वालों को आप चाहें तो उंगलियों पर गिन सकते हैं। अन्यथा इस देश में द्रौपदी का जो सम्मान हुआ है, उसे कृपया उस प्रसंग में देखिए जो हमारे मानस में चीरहरण के नाम से दर्ज है। द्रौपदी ने आर्त होकर पुकारा। माधव, माधव कहा और कृष्ण ने उसके वस्त्र को अनन्त आकार देकर दुश्शासन के पसीने छुड़वा दिए। यह घटना घटी हो या न घटी हो, पर हमने उसे बनाया और माना है। द्रौपदी के अद्वितीय नारी चरित्र को मान्यता देने का यह शानदार काम इस देश ने महाभारतकार के जरिए किया है।

मीराबाई 

मीराबाई कृष्ण-भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। उनका जन्म १५०४ ईस्वी में जोधपुर के ग्राम कुड्की में हुआ था। उनके पिता का नाम रत्नसिंह था। उनके पति कुंवर भोजराज उदयपुर के महाराणा सांगा के पुत्र थे। विवाह के कुछ समय बाद ही उनके पति का देहांत हो गया। पति की मृत्यु के बाद उन्हे पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया किन्तु मीरां इसके लिये तैयार नही हुई . वे संसार की ओर से विरक्त हो गयीं और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। कुछ समय बाद उन्होंने घर का त्याग कर दिया और तीर्थाटन को निकल गईं। वे बहुत दिनों तक वृंदावन में रहीं और फिर द्वारिका चली गईं। जहाँ संवत १५६० ईस्वी में उनका देहांत हुआ।

मीराबाई ने कृष्ण-भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है। जीवन परिचय

कृष्णभक्ति शाखा की हिंदी की महान कवयित्री मीराबाई का जन्म संवत् १५७३ में जोधपुर में चोकड़ी नामक गाँव में हुआ था। इनका विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था। ये बचपन से ही कृष्णभक्ति में रुचि लेने लगी थीं विवाह के थोड़े ही दिन के बाद आपके पति का स्वर्गवास हो गया था। पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन- प्रति- दिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं।

आनंद का माहौल तो तब बना, जब मीरा के कहने पर राजा महल में ही कृष्ण मंदिर बनवा देते हैं। महल में भक्ति का ऐसा वातावरण बनता है कि वहां साधु-संतों का आना-जाना शुरू हो जाता है। मीरा के देवर राणा जी को यह बुरा लगता है। ऊधा जी भी समझाते हैं, लेकिन मीरा दीन-दुनिया भूल कृष्ण में रमती जाती हैं और वैराग्य धारण कर जोगिया बन जाती हैं प्रचलित कथा के अनुसार मीरां वृंदावन में भक्त शिरोमणी जीव गोस्वामी के दर्शन के लिये गईं। गोस्वामी जी सच्चे साधु होने के कारण स्त्रियों को देखना भी अनुचित समझते थे। उन्होंने अन्दर से ही कहला भेजा कि हम स्त्रियों से नहीं मिलते, इस पर मीरां बाई का उत्तर बडा मार्मिक था। उन्होने कहा कि वृन्दावन में श्रीकृष्ण ही एक पुरुष हैं, यहां आकर जाना कि उनका एक और प्रतिद्वन्द्वी पैदा हो गया है। मीरां का ऐसा मधुर और मार्मिक उत्तर सुन कर जीव गोस्वामी नंगे पैर बाहर निकल आए और बडे प्रेम से उनसे मिले। इस कथा का उल्लेख सर्वप्रथम प्रियादास के कवित्तों में मिलता है – ‘वृन्दावन आई जीव गुसाई जू सो मिल झिली, तिया मुख देखबे का पन लै छुटायौ

मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गईं। वह जहाँ जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग आपको देवियों के जैसा प्यार और सम्मान देते थे। इसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को पत्र लिखा था :-

स्वस्ति

श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई। बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।। घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई। साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।। मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई। हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।

मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसी दास ने इस प्रकार दिया:-

जाके प्रिय न राम बैदेही। सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।। नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ। अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।

सती अनुसूया

अनुसूया अत्रि-ऋषि की पत्नी हैं। उनकी पति-भक्ति अर्थात् सतीत्व का तेज इतना अधिक था कि उसके कारण आकाशमार्ग से जाते देवों को उनके प्रताप का अनुभव होता था। इसी कारण उन्हें ‘सती अनुसूया’ भी कहा जाता हे। एक बार ब्रह्म, विष्णु और महेश ने उनके सतीत्व की परख करने की सोची, जो कि अपने आप में एक रोचक कथा है।

नारद जी लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती के पास पहुँचे और उन्हें अत्रि महामुनि की पत्नी अनुसूया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में बताया. इस पर त्रिदेवियों के मन में अनुसूया के प्रति ईर्ष्या पैदा हो गई। उन देवियों ने अनुसूया के पातिव्रत्य को नष्ट करने के लिए अपने पतियों को उनके पास भेजा।ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर यतियों के वेष धर कर अत्रि के आश्रम में पहुँचे और ‘‘भवतु भिक्षां देहि” कह कर द्वार पर खड़े हो गये। उस समय तक अत्रि महामुनि अपनी तपस्या समाप्त कर आश्रम को लौटे न थे। वे अतिथि-सत्कार की जिम्मेदारी अनुसूया पर छोड़ गये थे। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। उस समय कपट यति एक स्वर में बोले, ‘‘हे साध्वी, हमारा एक नियम है। तुम नग्न होकर परोसोगी, तभी जाकर हम भोजन करेंगे।”

अनुसूया ने ‘ओह, ऐसी बात है’ यह कहते हुए उन पर जल छिड़क दिया। इस पर तीनों अतिथि तीन प्यारे शिशुओं के रूप में बदल गये। अनुसूया के हृदय में वात्सल्य भाव उमड़ पड़ा। शिशुओं को दूध-भात खिलाया। त्रिमूर्ति शिशु रूप में अनुसूया की गोद में सो गये। अनुसूया तीनों को झूले में सुला कर बोली-‘‘तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गये, मेरे भाग्य को क्या कहा जाये। ब्रह्माण्ड ही इनका झूला है। चार वेद उस झूले के पलड़े की जंजीरें हैं। ओंकार प्रणवनाद ही इन के लिए लोरी है।” यों वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगी।

उसी समय कहीं से एक सफ़ेद बैल आश्रम में पहुँचा, और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम पर फुर्र से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आया और आकर द्वार पर उतर गया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुँचे। नारद अनुसूया से बोले- ‘‘माताजी, अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियाँ यहाँ पर आ गई हैं। ये अपने पतियों के वियोग के दुख से तड़प रही हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।”

अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- ‘‘माताओ, उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” तीनों देवियों ने चकित होकर देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गाढ़ी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं, तब नारद ने उनसे पूछा-‘‘आप क्या अपने पति को पहचान नहीं सकतीं? आप लजाइये नहीं, जल्दी गोद में उठा लीजिये।” देवियों ने जल्दी में एक-एक शिशु को उठा लिया।

वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खडे हो गये। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियाँ शर्मिंदा होकर दूर जा खड़ी हो गईं। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इस तरह सटकर खड़े हो गये, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गये हों।

उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आये। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे ।कालांतर में त्रिमूर्तियों के अंश से अत्रि के तीन पुत्र हुए – सोम (ब्रह्मा), दत्तात्रेय (विष्णु) और दुर्वासा (शिव)। कहीं कहीं दत्तात्रेय को त्रिमूर्तियों का समुच्चय रूप भी कहा गया है।

अरुन्धती

अरुन्धती ऋषि वशिस्ठ की पत्नी हैं। वह एक आदर्श पत्नी थी जिसने सच्चे दिल से अपने पति की सेवा करी और सुख दुःख में उनका साथ दिया।

एक बार सप्तर्षि, कश्यप, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदाग्नि और वसिष्ठ, हिमालय पर्वत पर तपस्या करने के लिए गए। वे अरुंधती को अकेला जंगल में बने आश्रम में छोड़ गए। इस बीच में भयंकर अकाल पड़ा जो बारह साल तक चला। ऋषियों ने हिमालय पर बारह वर्षों तक तपस्या की।

आश्रम में अरुंधति के खाने के लिए कुछ भी नहीं था। उसने भगवान शिव के तपस्या करनी शुरू कर दी। भगवान शिव उसकी परीक्षा लेने के लिए एक बूढे ब्राह्मण का वेश धारण करके आये। आश्रम में आकर उन्होंने कहा की हे माता मुझे भूख लगी है। मुझे कुछ खाने को दो। अरुंधति ने कहा, “हे ब्राह्मण, घर में खाने के लिए कुछ नहीं है, यें थोड़े बदरी के बीज हैं इन्ही को खा लीजिये”। भगवान शिव ने कहा, “क्या तुम इन बीजों को पका सकती हो?”

अरुंधति ने आग जलाई और बीज पकाने लगी। बीज पकाते हुए उसने ब्राह्मण की कथाएँ और धर्म की चर्चा शुरू कर दी। अरुन्धती बारह वर्षो तक धर्म की व्याख्या करती रही। बारह साल के अंत में अकाल समाप्त हो गया और सप्तर्षि भी हिमालय से लौट आए।

भगवान शिव अरुंधती की तपस्या से प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना असली रूप ले लिया। उन्होंने ऋषियों से कहा, “अरुंधती की तपस्या आपके द्वारा हिमालय पर की गयी तपस्या से अधिक थी!” भगवान शिव ने अरुंधती के रहने के स्थान को पवित्र किया और चले गए।

आज भी अरुन्धती सप्तर्षि मंडल में स्थित वसिष्ठ के पास ही दिखती हैं। नवविवाहित लड़कियों आकाश में अरुंधती को देखकर उनकी तरह आदर्श पत्नी बनने की कामना करती हैं।

अरुंधति हमारे देश की महान महिलाओं में से एक है और हमें उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए.

गार्गी

गर्गवंश में वचक्नु नामक महर्षि थे जिनकी पुत्री का नाम वाचकन्वी गार्गी था। बृहदारण्यक उपनिषद् में इनका ऋषि याज्ञवल्क्य के साथ बडा ही सुन्दर शास्त्रार्थ आता है।एक बार महाराज जनक ने श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी की परीक्षा लेने के लिए एक सभा का आयोजन किया। राजा जनक ने सभा को संबोधित करके कहा: “हे महाज्ञानीयों, यह मेरा सौभाग्य है कि आप सब आज यहाँ पधारे हैं। मैंने यहाँ पर १००० गायों को रखा है जिन पर सोने की मुहरें जडित है। आप में से जो श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी हो वह इन सब गायों को ले जा सकता है।” निर्णय लेना अति दुविधाजनक था, क्योंकि अगर कोई ज्ञानी अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी माने तो वह ज्ञानी कैसे कहलाये?

तब ऋषि याज्ञवल्क्य ने अपने शिष्यों से कहा: “हे शिष्यों! इन गायों को हमारे आश्रम की और हाँक ले चलो।” इतना सुनते ही सब ऋषि याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने लगे। याज्ञवल्क्य ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी उपस्थित थी।

याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने के लिए गार्गी उठीं और पूछा “हे ऋषिवर! क्या आप अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी मानते हैं?”

याज्ञवल्क्य बोले, “माँ! मैं स्वयं को ज्ञानी नही मानता परन्तु इन गायों को देख मेरे मन में मोह उत्पन्न हो गया है।” गार्गी ने कहा “आप को मोह हुआ, यह इनाम प्राप्त करने के लिए योग्य कारण नही है। आप को यह साबित करना होगा कि आप इस इनाम के योग्य हैं। अगर सर्व सम्मति हो तो में आपसे कुछ प्रश्न पूछना चाहूंगी, अगर आप इनके संतोषजनक जवाब प्रदान करें तो आप इस इनाम के अधिकारी होंगे।”

गार्गी का पहला सवाल बहुत ही सरल था। परन्तु उन्होंने अन्तत: याज्ञवल्क्य को ऐसा उलझा दिया कि वे क्रुध्द हो गए। गार्गी ने पूछा था, हे ऋषिवर! जल के बारे में कहा जाता है कि हर पदार्थ इसमें घुलमिल जाता है तो यह जल किसमें जाकर मिल जाता है?

अपने समय के उस सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवक्ल्य ने आराम से और ठीक ही कह दिया कि जल अन्तत: वायु में ओतप्रोत हो जाता है। फिर गार्गी ने पूछ लिया कि वायु किसमें जाकर मिल जाती है और याज्ञवल्क्य का उत्तर था कि अंतरिक्ष लोक में। पर गार्गी तो अदम्य थी वह भला कहां रुक सकती थी? वह याज्ञवल्क्य के हर उत्तर को प्रश्न में तब्दील करती गई और इस तरह गंधर्व लोक, आदित्य लोक, चन्द्रलोक, नक्षत्र लोक, देवलोक, इन्द्रलोक, प्रजापति लोक और ब्रह्म लोक तक जा पहुंची और अन्त में गार्गी ने फिर वही सवाल पूछ लिया कि यह ब्रह्मलोक किसमें जाकर मिल जाता है? इस पर गार्गी को लगभग डांटते हुए याज्ञवक्ल्य ने कहा-’गार्गी, माति प्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यापप्त्त्’ यानी गार्गी, इतने सवाल मत करो, कहीं ऐसा न हो कि इससे तुम्हारा भेजा ही फट जाए।

गार्गी का सवाल वास्तव में सृष्टि के रहस्य के बारे में था। अगर याज्ञवल्क्य उसे ठीक तरह से समझा देते तो उन्हें इस विदुषी दार्शनिका को डांटना न पड़ता। पर गार्गी चूंकि अच्छी वक्ता थी और अच्छा वक्ता वही होता है जिसे पता होता है कि कब बोलना और कब चुप हो जाना है, तो याज्ञवल्क्य की यह बात सुनकर वह परमहंस चुप हो गई।

पर अपने दूसरे सवाल में गार्गी ने दूसरा कमाल दिखा दिया। उसे अपने प्रतिद्वन्द्वी से यानी याज्ञवल्क्य से दो सवाल पूछने थे तो उसने बड़ी ही शानदार भूमिका बांधी। गार्गी बोली, “ऋषिवर सुनो। जिस प्रकार काशी या विदेह का राजा अपने धनुष पर डोरी चढ़ाकर, एक साथ दो अचूक बाणों को धनुष पर चढ़ाकर अपने दुश्मन पर सन्धान करता है, वैसे ही मैं आपसे दो प्रश्न पूछती हूँ।” यानी गार्गी बड़े ही आक्रामक मूड में थी और उसके सवाल बहुत तीखे थे।

याज्ञवल्क्य ने कहा- ‘पृच्छ गार्गी’ हे गार्गी, पूछो। गार्गी ने पूछा: ” स्वर्गलोक से ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है और इन दोनों के मध्य जो कुछ भी है; और जो हो चुका है और जो अभी होना है, ये दोनों किसमें ओतप्रोत हैं?”

पहला सवाल स्पेस के बारे में है तो दूसरा टाइम के बारे में है। स्पेस और टाइम के बाहर भी कुछ है क्या? नहीं है, इसलिए गार्गी ने बाण की तरह पैने इन दो सवालों के जरिए यह पूछ लिया कि सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है? याज्ञवल्क्य बोले, ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी।’ यानी कोई अक्षर, अविनाशी तत्व है जिसके प्रशासन में, अनुशासन में सभी कुछ ओतप्रोत है। गार्गी ने पूछा कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है तो याज्ञवल्क्य का उत्तर था- अक्षरतत्व के! इस बार याज्ञवल्क्य नें अक्षरतत्व के बारे में विस्तार से समझाया। वें अन्तत: बोले, गार्गी इस अक्षर तत्व को जाने बिना यज्ञ और तप सब बेकार है। अगर कोई इस रहस्य को जाने बिना मर जाए तो समझो कि वह कृष्ण है। और ब्राह्मण वही है जो इस रहस्य को जानकर ही इस लोक से विदा होता है।

इस बार गार्गी भी मुग्ध थी। अपने सवालों के जवाब से वह इतनी प्रभावित हुई कि महाराज जनक की राजसभा में उसने याज्ञवल्क्य को परम ब्रह्मिष्ठ मान लिया। इतने तीखे सवाल पूछने के बाद गार्गी ने जिस तरह याज्ञवल्क्य की प्रशंसा कर अपनी बात खत्म की तो उसने वाचक्नवी होने का एक और गुण भी दिखा दिया कि उसमें अहंकार का नामोंनिशान नहीं था। गार्गी ने याज्ञवल्क्य को प्रणाम किया और सभा से विदा ली।
याज्ञवल्क्य विजेता थे- गायों का धन अब उनका था। याज्ञवल्क्य ने नम्रता से राजा जनक को कहा: “राजन! यह धन प्राप्त कर मेरा मोह नष्ट हुआ है। यह धन ब्रह्म का है और ब्रह्म के उपयोग में लाया जाए यह मेरी नम्र विनती है।” इस प्रकार राजा जनक की सभा के द्वारा सभी ज्ञानीओं को एक महान पाठ और श्रेष्ठ विचारों की प्राप्ति हुई।ऐसी थी गार्गी वाचक्नवी, देश की विशिष्टतम दार्शनिक और युगप्रवर्तक।

रानी अहिल्याबाई

रानी अहिल्या बाई होल्कर एक ऐसा नाम है जिसे आज भी प्रत्येक भारत वासी बडी श्रद्धा से स्मरण करता है। वें एक महान शासक और मालवा की रानी थीं। इनका जन्म सन् 1725 में हुआ था और देहांत 13 अगस्त 1795 को।अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थीं लेकिन अपने राज्य काल में उन्होंने जो कुछ किया वह आश्चर्य चकित करने वाला है। वें एक बहादुर योद्धा और कुशल तीरंदाज थीं। उन्होंने कई युद्धों में अपनी सेना का नेतृत्व किया और हाथी पर सवार होकर वीरता के साथ लड़ी।

अपने जीवन काल में पति, पुत्र, पुत्री और दामाद सभी को अकाल मृत्यु का ग्रास बनते देखा। अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भी भारत-भर के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर बनवाए, घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, भूखों के लिए सदाब्रत (अन्नक्षेत्र ) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की।

उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए और धर्म शालाएं खुलवायीं। कहा जाता है क़ि रानी अहिल्‍याबाई के स्‍वप्‍न में एक बार भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्‍त थीं और इसलिए उन्‍होंने 1777 में विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया।

इंदौर वासी आज भी उन्हें अपनी माँ के रुप मे ही याद करते हैं। माँ अहिल्याबाई आत्म-प्रतिष्ठा के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं। अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी। उस काल में ना तो न्याय में शक्ति रही थी और न विश्वास। उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया-वह कल्पनातीत और चिरस्मरणीय है।

इंदौर में प्रति वर्ष भाद्रपद कृष्णा चतुर्दशी के दिन अहिल्योत्सव बडी धूमधाम से मनाया जाता है.

कित्तूर की रानी चेनम्मा

दक्षिण भारत के कर्णाटक राज्य में दो प्रसिद्ध वीरांगनाओं ने जन्म लिया था – केलाड़ी चेनम्मा और कित्तूर चेनम्मा। केलाड़ी चेनम्मा ने औरंगजेब से संघर्ष किया था और कित्तूर चेनम्मा ने अंग्रेजों के दाँत खट्टे किये थे।

लाड़ी कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में एक राज्य था। सन १६६४ में सोमशेखर नायक केलाड़ी का राजा बना। वह एक कुशल और धार्मिक राजा था। उसने अपने राज्य में कई सुधार कार्य किये।

एक बार राजा रामेश्वर मेले में गया था। वहां उसने एक बहुत ही सुंदर लड़की चेनम्मा को देखा। चेनम्मा की खूबसूरती ने राजा का ध्यान आकर्षित किया और वह उससे प्यार करने लगा। राजधानी लौटकर राजा ने अपने मुख्यमंत्री को बुलाकर चेन्नमा के बारे में बताया और उससे शादी करने की इच्छा व्यक्त की। मुख्यमंत्री ने एक सामान्य लड़की से शादी न करने की सलाह दी पर राजा ने कहा कि वह शादी करेगा तो सिर्फ चेनम्मा से वर्ना नहीं। अंततः राजा और चेनम्मा की शादी बड़ी धूमधाम और शाही वैभव के साथ संपन्न हुई। चेनम्मा राजघराने की गरिमा का सम्मान करते हुए एक कुशल रानी की तरह राजघराने का कार्य देखने लगी। वह राज्य के विषयों में रूचि लेती और महतवपूर्ण मामलों पर राजा को बहुमूल्य सलाह भी देती। चेनम्मा राजमहल के कर्मचारियों से अपने बच्चो की तरह प्यार करती थीं।

लेकिन अच्छा समय सदा के लिए नहीं रहता। चेनम्मा का पति एक नर्तकी के चक्कर में पड़ गया। वह राज-काज उपेक्षा कर नर्तकी के साथ ही रहने लगा। इससे राज्य की स्थिति ख़राब होने लगी। जब कलेड़ी की कमजोरी पडोसी राज्य बीजापुर के सुल्तान को पता लगी तो उसने इसे कलेड़ी पर आक्रमण करने का सुनहरा अवसर माना। यह देखकर चेनम्मा ने शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। जिन हाथों में चूड़ियाँ हुआ करती थीं अब उन हाथों में तलवार थी। इस बीच बीजापुर के सुलतान ने चेनम्मा के पति की हत्या करा दी। चेनम्मा निसंतान थी। राज्य के वारिस के रूप में उसने बसप्पा नायक को गोद ले लिया। चेनम्मा के मंत्रिमंडल में अति विश्वसनीय और कुशल मंत्री थे और सेना में बहादुर सैनिक। उसके नेतृत्व में कलेड़ी की सेना ने बीजापुर के सुल्तान के गलत इरादों को नेस्तनाबूद कर दिया। युद्ध में चेनम्मा के हाथों बीजापुर परस्त हुआ। सन १६७१ में चेनम्मा को आधिकारिक तौर पर कलेड़ी की रानी घोषित किया गया। इसके बाद पच्चीस वर्षों तक चेनम्मा ने कलेड़ी पर राज्य किया।

चेनम्मा के राज्यकाल में कलेड़ी में शांति स्थापित हुई। इससे राज्य में खुशहाली बढ़ी। उन्होंने कई प्रकार के धार्मिक कार्य किये। मंदिरों का जीर्णोद्धार कर विशेष पूजा की व्यवस्था की। मठों को स्थापित करने के लिए भूमि दी और अन्य राज्यों के विद्वानों को कलेड़ी में बसने के लिए आमंत्रित किया। इसके लिए उन्होंने विद्वानों के लिए घरों की व्यवस्था की। चेनम्मा बहुत ही धार्मिक विचारों की रानी थी और अपनी सभी विजयों का श्रेय भगवान् को देती थीं। चेनम्मा के प्रभाव को बढ़ते देखकर पडोसी राज्य मैसूर की सेना ने उस पर हमला कर दिया। उन्होंने मैसूर की सेना को दो बार परास्त किया। अंततः मैसूर के राजा ने कलेड़ी से संधि करनी पड़ी।

प्रत्येक दिन, रानी चेनम्मा प्रार्थना और पूजा के बाद भिक्षुओं और सन्यासियों को दान देती थीं। एक बार चार सन्यासी रानी के पास आये। इन चारों का व्यवहार सन्यासियों जैसा नहीं था जिसे रानी ने भांप लिया। रानी के पूछने पर इन चारों का सरदार ने बताया की वह छत्रपति शिवाजी का पुत्र रामराज है। शिवाजी के पुत्र को इस हालत में देखकर रानी दंग रह गयी। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि पूरे महाराष्ट्र में हिन्दुओं की रक्षा करने वाले शिवाजी के पुत्र उनके राज्य में शरण चाहते हैं। राजाराम ने औरंगजेब द्वारा उनके भाई शम्भाजी कि हत्या और हिन्दुओं पर उसके अत्याचार की बात सुनकर रानी को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने राजाराम और उसके साथियों को शरण दी और कर्मचारियों को निर्देश दिया कि उनकी देखभाल एक विशिस्ट अतिथि की तरह हो। औरंगजेब ने चेनम्मा द्वारा शिवाजी के पुत्र को शरण देने का बहाना बनाकर कलेड़ी पर आक्रमण कर दिया। लेकिन चेनम्मा की बहादुर सेना ने औरंगजेब की सेना के दाँत खट्टे कर दिए और अंततः मुग़ल सेना को कलेड़ी के साथ संधि करनी पड़ी।

ऐसी वीरांगना और धर्मपरायण नारी थी कलेड़ी की रानी चेनम्मा। इनका नाम सुनहरे अक्षरों में भारत के इतिहास में लिखा है।

लेड़ी की चेनम्मा की तरह ही बहादुर वीरांगना थी कित्तूर की चेनम्मा। सन् 1857 के स्वाधीनता आंदोलन के 33 साल पहले कित्तूर की रानी चेनम्मा ने अंग्रेजों का विरोध करते हुए उनके साथ सशस्त्र संघर्ष किया और अपने साहस एवं पराक्रम से उन्हें चकित कर दिया था। रानी चेनम्मा के साहस एवं उनकी वीरता के कारण उन्हें विशेष सम्मान हासिल है और उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है।

कर्नाटक में बेलगाम के पास 1778 में पैदा हुई चेनम्मा की बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारवाजी, तीरंदाजी में विशेष रुचि थी। इनकी शादी बेलगाम में कित्तूर राजघराने में हुई। चेनम्मा के साथ प्रकृति ने कई बार क्रूर मजाक किया। अल्पायु में ही पति का निधन हो गया और कुछ साल बाद एकलौते पुत्र का भी निधन हो गया। चेनम्मा ने पुत्र की मौत के बाद शिवलिंगप्पा को अपना उत्ताराधिकारी बनाया। अंग्रेजों ने रानी के इस कदम को स्वीकार नहीं किया और शिवलिंगप्पा को पद से हटाने का आदेश दिया। उन्होंने अंग्रेजों का आदेश स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में रानी चेनम्मा ने अपूर्व शौर्य का प्रदर्शन किया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की विशाल व शक्तिशाली सशस्त्र सेना ने कित्तूर दुर्ग को घेर लिया था। अचानक कित्तूर दुर्ग का फाटक खुला और देखते ही देखते अन्दर से एक वीरागंना पुरुष वेश में शेरनी के समान गरजते हुए शत्रु दल पर टूट पड़ी । भयानक युद्ध हो रहा था, रानी रणचण्डी बन शत्रु के सैनिकों का संहार कर रही थीं, थैकरे मारा गया और अग्रेंजी सेना भाग खड़ी हुई। पुन: अग्रेजों ने दुर्ग पर डेरा डाला, कित्तूर की फौज ने दृढ़ता के साथ प्रतिरोध किया। रानी की सेना को पराजित करने से पहले ब्रिटिश सेना को अपनी सैन्य शक्ति को सुदृढ करने के लिए बाध्य होना पड़ा। रानी लंबे समय तक अंग्रेजी सेना का मुकाबला नहीं कर सकी। उन्हें कैद कर बेलहोंगल किले में रखा गया जहां उनकी मृत्यु हो गई। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह पूरी न हो सकी थी। यह संयोग ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के छः वर्ष बाद काशी में ही लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ।

इतिहास के पन्नों में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली प्रथम वीरांगना कित्तूर की रानी चेनम्मा को ही माना जाता है।

रानी दुर्गावती

मध्य प्रदेश गौंडवाना ( जबलपुर, मंडला, नरसिंहपुर, दमोह) की महारानी जिसने देशभक्ति के लिए अपने प्राणोत्सर्ग किए , उनकी वीरता के किस्से आज भी लोग दोहराते मिल जायेंगे.

गोंडवाना साम्राज्य के गढ़ा-मंडला सहित ५२ गढ़ों की शासक वीरांगना रानी दुर्गावती कालिंजर के चंदेल राजा कीर्तिसिंह की इकलौती संतान थी। महोबा के राठ गाँव में सन् १५२४ की नवरात्रि दुर्गा अष्टमी के दिन जन्म होने के कारण इनका नाम दुर्गावती से अच्छा और क्या हो सकता था। रूपवती, चंचल, निर्भय वीरांगना दुर्गा बचपन से ही अपने पिता जी के साथ शिकार खेलने जाया करती थी। ये बाद में तीरंदाजी और तलवार चलाने में निपुण हो गईं। गोंडवाना शासक संग्राम सिंह के पुत्र दलपत शाह की सुन्दरता, वीरता और साहस की चर्चा धीरे धीरे दुर्गावती तक पहुँची परन्तु जाति भेद आड़े आ गया . फ़िर भी दुर्गावती और दलपत शाह दोनों के परस्पर आकर्षण ने अंततः उन्हें परिणय सूत्र में बाँध ही दिया . विवाहोपरांत दलपतशाह को जब अपनी पैतृक राजधानी गढ़ा रुचिकर नहीं लगी तो उन्होंने सिंगौरगढ़ को राजधानी बनाया और वहाँ प्रासाद, जलाशय आदि विकसित कराये. रानीदुर्गावती से विवाह होने के ४ वर्ष उपरांत ही दलपतशाह की मृत्यु हो गई और उनके ३ वर्षीय पुत्र वीरनारायण को उत्तराधिकारी घोषित किया गया. रानी ने साहस और पराक्रम के साथ १५४९ से १५६५ अर्थात १६ वर्षों तक गोंडवाना साम्राज्य का कुशल संचालन किया. प्रजा हितार्थ कार्यों के लिए रानी की सदैव प्रशंसा की जाती रही. उन्होंने अपने शासन काल में जबलपुर में दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल, मंत्री के नाम पर अधारताल आदि जलाशय बनवाये. गोंडवाना के उत्तर में गंगा के तट पर कड़ा मानिकपुर सूबा था. वहाँ का सूबेदार आसफखां मुग़ल शासक अकबर का रिश्तेदार था. वहीं लालची और लुटेरे के रूप में कुख्यात भी था. अकबर के कहने पर उसने रानी दुर्गावती के गढ़ पर हमला बोला परन्तु हार कर वह वापस चला गया, लेकिन उसने दुबारा पूरी तैयारी से हमला किया जिससे रानी की सेना के असंख्य सैनिक शहीद हो गए. उनके पास मात्र ३०० सैनिक बचे. जबलपुर के निकट नर्रई नाला के पास भीषण युद्ध के दौरान जब झाड़ी के पीछे से एक सनसनाता तीर रानी की दाँयी कनपटी पर लगा तो रानी विचलित हो गयीं. तभी दूसरा तीर उनकी गर्दन पर आ लगा तो रानी ने अर्धचेतना अवस्था में मंत्री अधारसिंह से अपने ही भाले के द्बारा उन्हें समाप्त करने का आग्रह किया. इस असंभव कार्य के लिए आधार सिंह द्बारा असमर्थता जताने पर उन्होंने स्वयं अपनी तलवार से अपना सिर विच्छिन्न कर वीरगति पाई. वे किसी भी कीमत पर जिन्दा रहते हुए दुश्मन के आगे समर्पण नहीं करना चाहती थीं और मरते दम तक शेरनी की तरह मैदान में डटी रहीं. उनके शासन काल में प्रजा सुखी और संपन्न थी. राज्य का कोष समृद्ध था जिसे आसफखां लेकर वापस लौट गया. आज भी राज्य की सम्पन्नता के बारे में चर्चाएँ होती हैं.

रानी लक्ष्मीबाई


बलिदानों की धरती भारत में ऐसे-ऐसे वीरों ने जन्म लिया है, जिन्होंने अपने रक्त से देशप्रेम की अमिट गाथाएँ लिखीं। यहाँ की ललनाएँ भी इस कार्य में कभी किसी से पीछे नहीं रहीं। इन्हीं में से एक नाम है झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई।

19 नवंबर, 1835 ई. के दिन काशी में मोरोपन्त जी की पत्नी भागीरथी बाई ने एक पुत्री को जन्म दिया। पुत्री का नाम मणिकार्णिक रखा गया परन्तु प्यार से मनु पुकारा जाता था। मनु की अवस्था अभी चार-पाँच वर्ष ही थी कि उसकी माँ का देहान्त हो गया। मनु के पिता मोरोपन्त जी मराठा पेशवा बाजीराव की सेवा में थे। चूँकि घर में मनु की देखाभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए पिता मनु को अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गए जहाँ चञ्चल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया। लोग उसे प्यार से “छबीली” बुलाने लगे।

पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों के साथ पढ़ने लगी। मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ-साथ ही तीर-तलवार तथा बन्दूक से निशाना लगाना सीखा। इस प्रकार मनु अल्प अवस्था में ही अस्र-शस्र चलाने में पारंगत हो गई। अस्र-शस्र चलाना एवं घुड़सवारी करना मनु के प्रिय खेल थे।

समय बीता और मनु विवाह योग्य हो गयी। झाँसी के राजा गंगाधार राव के साथ मनु का विवाह बड़े ही धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। विवाह के पश्चात् मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। इस प्रकार काशी की कन्या मनु झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बन गई।

रानी बनकर लक्ष्मीबाई को पर्दे में रहना पड़ता था। स्वच्छन्द विचारों वाली रानी को यह रास नहीं आया। उन्होंने किले के अन्दर ही एक व्यायामशाला बनवाई और शस्रादि चलाने तथा घुड़सवारी हेतु आवश्यक प्रबन्ध किए। उन्होंने स्रियों की एक सेना भी तैयार की।

राजा गंगाधर राव अपनी पत्नी की योग्यता से अतीव प्रसन्न थे।

रानी अत्यन्त दयालु भी थीं। एक दिन जब कुलदेवी महालक्ष्मी की पूजा करके लौट रही थीं, कुछ निर्धन लोगों ने उन्हें घेर लिया। उन्हें देखकर महारानी का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने नगर में घोषणा करवा कर एक निश्चित दिन गरीबों में वस्रादि का वितरण कराया।

कुछ समय पश्चात् रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। सम्पूर्ण झाँसी आनन्दित हो उठा एवं उत्सव मनाया गया किन्तु यह आनन्द अल्पकालिक ही था। कुछ ही महीने बाद बालक गम्भीर रुप से बीमार हुआ और उसकी मृत्यु हो गयी। झाँसी शोक के सागर में डूब गई। शोकाकुल राजा गंगाधर राव भी बीमार रहने लगे एवं मृतप्राय हो गये। दरबारियों ने उन्हें पुत्र गोद लेने की सलाह दी। अपने ही परिवार के पाँच वर्ष के एक बालक को उन्होंने गोद लिया और उसे अपना दत्तक पुत्र बनाया। इस बालक का नाम दामोदर राव रखा गया। गोद लेने के दूसरे दिन ही राजा गंगाधर राव की दु:खद मृत्यु हो गयी।

इसी के साथ रानी पर शोक का पहाड़ टूट पड़ा। झाँसी का प्रत्येक व्यक्ति रानी के दु:ख से शोकाकुल हो गया।

उस समय भारत के बड़े भू-भाग पर अंग्रेजों का शासन था। वे झाँसी को अपने अधीन करना चाहते थे। उन्हें यह एक उपयुक्त अवसर लगा। उन्हें लगा रानी लक्ष्मीबाई स्त्री है और हमारा प्रतिरोध नहीं करेगी। उन्होंने रानी के दत्तक-पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया और रानी के पत्र लिख भेजा कि चूँकि राजा का कोई पुत्र नहीं है, इसलिए झाँसी पर अब अंग्रेजों का अधिकार होगा। रानी यह सुनकर क्रोध से भर उठीं एवं घोषणा की कि मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। अंग्रेज तिलमिला उठे। परिणाम स्वरुप अंग्रेजों ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने भी युद्ध की पूरी तैयारी की। किले की प्राचीर पर तोपें रखवायीं। रानी ने अपने महल के सोने एवं चाँदी का सामान तोप के गोले बनाने के लिए दे दिया।

रानी के किले की प्राचीर पर जो तोपें थीं उनमें कड़क बिजली, भवानी शंकर, घनगर्जन एवं नालदार तोपें प्रमुख थीं। रानी के कुशल एवं विश्वसनीय तोपची थे गौस खाँ तथा खुदा बक्श। रानी ने किले की मजबूत किलाबन्दी की। रानी के कौशल को देखकर अंग्रेज सेनापित ह्यूरोज भी चकित रह गया। अंग्रेजों ने किले को घेर कर चारों ओर से आक्रमण किया।

अंग्रेज आठ दिनों तक किले पर गोले बरसाते रहे परन्तु किला न जीत सके। रानी एवं उनकी प्रजा ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि अन्तिम साँस तक किले की रक्षा करेंगे। अंग्रेज सेनापति ह्यूराज ने अनुभव किया कि सैन्य-बल से किला जीतना सम्भव नहीं है। अत: उसने कूटनीति का प्रयोग किया और झाँसी के ही एक विश्वासघाती सरदार दूल्हा सिंह को मिला लिया जिसने किले का दक्षिणी द्वार खोल दिया। फिरंगी सेना किले में घुस गई और लूटपाट तथा हिंसा का पैशाचिक दृश्य उपस्थित कर दिया।

घोड़े पर सवार, दाहिने हाथ में नंगी तलवार लिए, पीठ पर पुत्र को बाँधे हुए रानी ने रणचण्डी का रुप धारण कर लिया और शत्रु दल संहार करने लगीं। झाँसी के वीर सैनिक भी शत्रुओं पर टूट पड़े। जय भवानी और हर-हर महादेव के उदघोष से रणभूमि गूँज उठी। किन्तु झाँसी की सेना अंग्रेजों की तुलना में छोटी थी। रानी अंग्रेजों से घिर गयीं। कुछ विश्वासपात्रों की सलाह पर रानी कालपी की ओर बढ़ चलीं। दुर्भाग्य से एक गोली रानी के पैर में लगी और उनकी गति कुछ धीमी हुई। अंग्रेज सैनिक उनके समीप आ गए।

रानी ने पुन: अपना घोड़ा दौड़ाया। दुर्भाग्य से मार्ग में एक नाला आ गया। घोड़ा नाला पार न कर सका। तभी अंग्रेज घुड़सवार वहां आ गए। एक ने पीछे से रानी के सिर पर प्रहार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग कट गया और उनकी एक आँख बाहर निकल आयी। उसी समय दूसरे गोरे सैनिक ने संगीन से उनके हृदय पर वार कर दिया। अत्यन्त घायल होने पर भी रानी अपनी तलवार चलाती रहीं और उन्होंने दोनों आक्रमणकारियों का वध कर डाला। फिर वे स्वयं भूमि पर गिर पड़ी। पठान सरदार गौस खाँ अब भी रानी के साथ था। उसका रौद्र रुप देख कर गोरे भाग खड़े हुए।

स्वामिभक्त रामराव देशमुख अन्त तक रानी के साथ थे। उन्होंने रानी के रक्त रंजित शरीर को समीप ही बाबा गंगादास की कुटिया में पहुँचाया। रानी ने व्यथा से व्याकुल हो जल माँगा और बाबा गंगादास ने उन्हें जल पिलाया।

रानी को असह्य वेदना हो रही थी परन्तु मुखमण्डल दिव्य कान्त से चमक रहा था। उन्होंने एक बार अपने पुत्र को देखा और फिर वे तेजस्वी नेत्र सदा के लिए बन्द हो गए। वह १८ जून १८५९ का दिन था जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गयी। उसी कुटिया में उनकी चिता लगायी गई जिसे उनके पुत्र दामोदर राव ने मुखाग्नि दी। दानी का पार्थिव शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो गया और वे सदा के लिए अमर हो गयीं। आज भी उनकी वीरता के गीत प्रसिद्ध हैं –

बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थीं।।


राजमाता जीजाबाई

उपनाम : जीजामाता जन्मस्थल : महाराष्ट्र
मृत्युस्थल : महाराष्ट्र आन्दोलन : मराठा संग्राम

जन्म और पारिवारिक जीवन : मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी राजा भोसलेकी माता जीजाबाईका जन्म सिंदखेड गांव में हुआ था । यह स्थान वर्तमानमें महाराष्ट्रके विदर्भ प्रांतमें बुलढाणा जिलेके मेहकर जनपदके अन्तर्गत आता है । उनके पिताका नाम लखुजी जाधव तथा माताका नाम महालसाबाई था । जीजाबाई उच्चकुलमें उत्पन्न असाधारण प्रतिभाशाली स्त्री थीं । जीजाबाई जाधव वंशकी थीं और उनके पिता एक शक्तिशाली सामन्त थे । जीजाबाईका विवाह शाहजीके साथ अल्प आयुमें ही हो गया था । उन्होंने राजनीतिक कार्योंमें सदैव अपने पतिका साथ दिया । शाहजीने तत्कालीन निजामशाही सल्तनतपर मराठा राज्यकी स्थापनाका प्रयास किया । परंतु वे मुगलों और आदिलशाहीके संयुक्त बलोंसे हार गए थे । संधिके अनुसार उनको दक्षिण जानेके लिए बाध्य किया गया था । उस समय शिवाजीकी आयु मात्र १४ सालकी थी अतः वे मांके साथ ही रहे । बडे बेटे संभाजी अपने पिताके साथ गए । जीजाबाईका पुत्र संभाजी तथाउनके पति शाहजी अफजल खानकेसाथ एक युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हुए । शाहजीकी मृत्यु होनेपर जीजाबाई ने सती (अपने आप को पति की चिता में जल द्वारा आत्महत्या) होने का प्रयत्न किया, परंतु शिवाजीने अपने अनुरोधसे उन्हें ऐसा करनेसे रोक दिया । प्रेरक मातृत्व वीर माता जीजाबाई छत्रपति शिवाजीकी माता होनेके साथ- साथ उनकी मित्र, मार्गदर्शक और प्रेरणास्त्रोत भी थीं । उनका सारा जीवन साहस और त्यागसे पूर्ण था । उन्होंने जीवन भर कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियोंको झेलते हुए भी धैर्य नहीं खोया और अपने पुत्र ‘शिवा’ को वे संस्कार दिए, जिनके कारण वह आगे चलकर हिंदू समाजके संरक्षक ‘छात्रपति शिवाजी महाराज’ बने । शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता- पिता का बहुत प्रभाव पडा । बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओंको भली प्रकार समझने लगे थे ।

परमयोगिनी मुक्ताबाई 

जो लोहेको सोना कर दे, वह पारस है कच्चा।जो लोहेको पारस कर दे, वह पारस है सच्चा॥महाराष्ट्र में समर्थ रामदास स्वामी, श्री एकनाथजी, नामदेवजी ऐसे ही संत हुए। एक परिवार का परिवार वहाँ संतों की सर्वश्रेष्ठ गणना में है और वह परिवार है श्रीनिवृत्तिनाथ जी का। निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव और इनकी छोटी बहिन मुक्ताबाई- सब के सब जन्म से सिद्ध योगी,परमज्ञानी, परमविरक्त एवं सच्चे भगवद्भक्त थे। जन्म से ही सब महापुरुष। आजन्म ब्रह्मचारी रहकर जीवों के उद्धार के लिये ही दिव्यजगत् से इस मूर्ति चतुष्टय का धरा पर अविर्भाव हुआ।
‘नाम और रूप की पृथक- पृथक कल्पना मिथ्या है। सब नाम विट्ठल के ही नाम हैं। सब रूप उसी पण्ढरपुर में कमर पर हाथ रखकर ईंट पर खड़े रहने वाले खिलाड़ी ने रख छोड़े हैं। उन पाण्डुरंग के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।’ बड़े भाई निवृत्तिराथ ही सबके गुरु थे। उन्होंने ही छोटे भाईयोंऔर बहिन को यह उपदेश दिया था।‘विठोबा बड़े अच्छे हैं।’ बारह वर्ष की बालिका मुक्ता बाई कभी- कभी बड़ी प्रसन्न होती। किसी सुन्दर पुष्प को लेकर वह तन्मय हो जाती। ‘इतना मृदुल, इतना सुरभित, इतना सुन्दर रूप बनाया है, उन्होंने।’ अपने बड़े भाई के उपदेश को हृदय से उसने ग्रहण कर लिया था।
‘बड़े नटखट हैं पाण्डुरंग।’ कभी वह झल्ला उठती, जब हाथों में काँटा चुभ जाता। ‘काँटा, कंकड़ ,, पत्थर- जाने इन रूपों के धारण में उन्हें क्या आनन्द आता है। अपने हाथों के दर्द पर उसका ध्यान कम ही जाता था।’‘छिः, छिः, विठोबा बड़े गंदे हैं।’ एक दिन उसने अपने बड़े भाई को दिखाया। ‘दादा! देखो न, इस गंदी नाली में कीड़े बने बिलबिला रहे हैं! राम! राम!’ उसके दादा ने उसे डाँट दिया। यह डाँटना व्यर्थ था। उस शुद्ध हृदय में मनन चल रहा था। पशु- पक्षी, स्थावर- जङ्गमं एक व्यापक सर्वेश को देखने की साधना थी यह।‘दादा! आज दीपावली है। ज्ञान और सोपान दादा भिक्षा में सभी कुछ ले आये हैं। क्या बनाऊँ, भिक्षा में आटा, दाल, बेसन, घी, शाक देखकर बालिका अत्यन्त प्रसन्न हो गयी थी। अपने बड़े भाई की वह कुछ सेवा कर सके, इससे बड़ा आनंद उसने दूसरा कभी समझा ही नहीं था।’‘मेरा मन चील्हा खाने का होता है।’ निवृत्तिनाथ ने साधारण भाव से कह दिया।‘नमकीन भी बनाऊँगी और मीठे भी।’ बड़ी प्रसन्नता से उछलती- कूदती वह चली गयी। परन्तु घर में तवा तो है ही नहीं। बर्तन तो विसोबा चाटी ने कल रात्रि में सब चोरी करा दिये। बिना तवे के चील्हेकिस प्रकार बनेंगे। जल्दी से मिट्टी का तवा लाने वह कुम्हारों के घर की ओर चल पड़ी। मार्ग में हीविसोबा से भेंट हो गयी। ईर्ष्यालु ब्राह्मण के पूछने पर मुक्ताबाई ने ठीक- ठीक बता दिया।माँगेंगे भीख और जीभ इतनी चलती है। विसोबा साथ लग गया। उसने कुम्हारों को मना कर दिया ‘जो इस संयासी की लड़की को तवा देगा, उसे मैं जाति से बाहर करा दूँगा।’विवश होकर मुक्ताबाई को लौटना पड़ा। उसका मुख उदास हो रहा था। घर पहुँचते ही ज्ञानेश्वर ने उसकी उदासी का कारण पूछा। बालिका ने सारा हाल सुना दिया।‘पगली, रोती क्यों है! तुझे चील्हे बनाने हैं या तवे का अचार डालना है?’ बहिन को समझाकर ज्ञानेश्वर नंगी पीठ करके बैठ गये। उन योगिराज ने प्राणों का संयम करके शरीर में अग्नि की भावना की पीठ तप्त तवे की भाँति लाल हो गयी। ‘ले; जितने चील्हे सेंकने हो, इस पर सेंक ले।’मुक्ताबाई स्वयं परमयोगिनी थीं। भाइयों की शक्ति उनसे अविदित नहीं थी। उन्होंने बहुत से मीठे और नमकीन चील्हे बना लिये। ‘दादा! अपने तवे को अब शीतल कर लो!’ सब बनाकर उन्होंने भाई से कहा। 
ज्ञानेश्वर ने अग्निधारण का उपसंहार किया।‘मुक्ति ने निर्मित किये और ज्ञान की अग्नि में सेंके गये! चील्हों के स्वाद का क्या पूछना।’निवृत्तिनाथ, भोजन करते हुए भोजन की प्रशंसा कर रहे थे। इतने में एक बड़ा- सा काला कुत्ता आया और अवशेष चील्हे मुख में भरकर भागने लगा। तीनों भाई साथ ही बैठे थे। उनका भोजन प्रायः समाप्त हो चुका था। निवृत्तिनाथ ने कहा- ‘मुक्ता! जल्दी से कुत्ते को मार, सब चील्हे ले जायेगा तो तू ही भूखी रहेगी!’‘मारूँ किसे? विट्ठल ही तो कुत्ता भी बन गये हैं!’ मुक्ताबाई ने बड़ी निश्चिन्तता से कहा। उन्होंने कुत्ते की ओर देखा तक नहीं।तीनों भाई हँस पड़े। ज्ञानेश्वर ने पूछा- ‘कुत्ता तो विट्ठल बन गये हैं और विसोबाचाटी?’‘वे भी विट्ठल ही हैं!’ मुक्ता का स्वर ज्यों का त्यों था।
विसोबा चाटी मुक्ता के साथ ही कुम्हार के घर से पीछा करता आया था। वह देखना चाहता था कि तवा न मिलने पर ये सब क्या करते हैं? ज्ञानेश्वर की पीठ पर चील्हे बनते देख उसे बड़ी जलन हुई। जाकर कुत्ते को वही पकड़ लाया था। मुक्ता के शब्दों ने उसके हृदय बाण की भाँति आघात किया। वह जहाँ छिपा था वहाँ से बाहर निकल कर मुक्ताबाई से बोला, ‘‘मैं महा- अधम हूँ। मैंने आप लोगों को कष्ट देने में कुछ भी उठा नहीं रखा है। आप दयामय हैं, साक्षात् विट्ठल के स्वरूप हैं। मुझ पामर को क्षमा करें। मेरा उद्धार करें, मुझे अपने चरणों में स्थान दें।’’

कई दिनों तक विसोबा ने बड़ा आग्रह किया। उसके पश्चात्ताप एवं हठ को देखकर निवृत्तिनाथ ने मुक्ताबाई को उसे दीक्षा देने का आदेश दिया। मुक्ताबाई ने उसे दीक्षा दी। मुक्ताबाई की कृपा सेविसोबा चाटी जैसा ईष्यालु ब्राह्मण प्रसिद्ध महात्मा विसोबा खेचर हो गया। उसने योग के द्वारा समाधि अवस्था प्राप्त की। महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध महात्मा नामदेव जी इन्हीं विसोबा खेचर के शिष्य हुए हैं।